कोरबा, 05 अप्रैल 2026 दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे (SECR) के लिए ‘सोने का अंडा’ देने वाली मुर्गी कहे जाने वाले कोरबा जिले ने एक बार फिर राजस्व के मामले में इतिहास रच दिया है। वित्त वर्ष 2025-26 में SECR ने माल परिवहन (Freight Loading) में 200 मिलियन टन से अधिक का जो नया रिकॉर्ड बनाया है, उसमें कोरबा के कोयला लदान की हिस्सेदारी सर्वाधिक रही है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस कोरबा की बदौलत रेलवे का खजाना भर रहा है, वहां के यात्री आज भी बुनियादी सुविधाओं और नई ट्रेनों के लिए तरस रहे हैं।
कमाई में नंबर-1, सुविधाओं में फिसड्डी
आंकड़ों के अनुसार, बिलासपुर मंडल के कुल राजस्व का एक बड़ा हिस्सा अकेले कोरबा से आता है। यहाँ से प्रतिदिन दर्जनों कोयला मालगाड़ियाँ देश के विभिन्न बिजली घरों के लिए रवाना होती हैं। रेलवे को यहाँ से सालाना अरबों रुपये का राजस्व प्राप्त होता है, लेकिन जब बात यात्री सुविधाओं की आती है, तो कोरबा को हमेशा उपेक्षित रखा जाता है। स्थानीय यात्रियों का कहना है कि कोरबा केवल एक “मालगाड़ी जंक्शन” बनकर रह गया है।
नई ट्रेनों और विस्तार की पुरानी मांग
कोरबा के यात्रियों की लंबे समय से मांग है कि यहाँ से लंबी दूरी की नई ट्रेनें शुरू की जाएं, लेकिन रेलवे प्रशासन इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है। प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:
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छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस का विस्तार: अमृतसर तक जाने वाली इस ट्रेन का विस्तार कोरबा तक करने की मांग वर्षों पुरानी है।
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इंटरसिटी ट्रेनों की कमी: रायपुर और बिलासपुर के लिए ट्रेनों की संख्या बढ़ाने की जरूरत है ताकि दैनिक यात्री सुगमता से सफर कर सकें।
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साउथ और वेस्ट के लिए सीधी कनेक्टिविटी: दक्षिण और पश्चिम भारत के प्रमुख शहरों के लिए कोरबा से सीधी ट्रेनों का अभाव है, जिससे यात्रियों को बिलासपुर या चांपा में घंटों इंतजार करना पड़ता है।
स्टेशन पर सुविधाओं का अभाव
राजस्व का रिकॉर्ड बनाने के बावजूद कोरबा रेलवे स्टेशन के आधुनिकीकरण की गति बेहद धीमी है। यात्रियों की मुख्य शिकायतें हैं:
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प्लेटफॉर्म की कमी: अधिक ट्रेनों के संचालन के लिए प्लेटफॉर्म और पिट लाइन का विस्तार जरूरी है।
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साफ-सफाई और सुरक्षा: स्टेशन परिसर में स्वच्छता और सुरक्षा व्यवस्था आज भी संतोषजनक नहीं है।
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पार्किंग और शेड: बढ़ती भीड़ के मुकाबले पार्किंग की जगह कम है और प्लेटफॉर्म पर शेड की कमी के कारण यात्रियों को धूप और बारिश में परेशानी होती है।
जनता में आक्रोश
रेलवे की इस बेरुखी को लेकर स्थानीय नागरिक संगठनों और यात्री संघों में भारी आक्रोश है। उनका तर्क है कि जब कोरबा रेलवे को सबसे ज्यादा मुनाफा दे रहा है, तो उस मुनाफे का एक हिस्सा यहाँ की यात्री सुविधाओं को बेहतर करने में क्यों खर्च नहीं किया जा रहा?

