कोरबा, 13 मार्च 2026: औद्योगिक नगरी कोरबा के ग्रामीण अंचलों में पराली (धान के अवशेष) जलाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। प्रशासन की सख्त पाबंदी और हिदायतों के बावजूद किसान खेतों में आग लगा रहे हैं, जिससे न केवल पर्यावरण को भारी नुकसान पहुँच रहा है, बल्कि अब यह आग रिहायशी इलाकों और बेशकीमती पेड़-पौधों तक भी फैलने लगी है।
प्रदूषण और प्रकृति पर दोहरी मार
कोरबा जिले के करतला, पाली और कटघोरा ब्लॉक के कई गांवों से आगजनी की खबरें आ रही हैं। खेतों में लगाई गई यह आग अनियंत्रित होकर आसपास की झाड़ियों और बाड़ियों तक पहुँच रही है।
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मिट्टी की उर्वरता: विशेषज्ञों का कहना है कि आग लगाने से मिट्टी के मित्र कीट मर रहे हैं और जमीन की उपजाऊ शक्ति खत्म हो रही है।
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पेड़ों का नुकसान: आग की चपेट में आने से फलदार और छायादार वृक्ष भी झुलस रहे हैं, जिससे हरियाली कम हो रही है।
मवेशियों के पेट पर लात
खेतों में मौजूद हरी घास और धान के अवशेष (पैरा) मवेशियों के लिए मुख्य आहार होते हैं। पराली जलाने से यह चारा पूरी तरह नष्ट हो गया है। ग्रामीणों का कहना है:
“एक तरफ भीषण गर्मी दस्तक दे रही है, दूसरी तरफ खेतों की घास जला दी गई है। अब हमारे पशुओं के लिए चारा जुटाना मुश्किल हो गया है।”
प्रशासन की सख्ती और अपील
कलेक्टर कोरबा ने सभी तहसीलदारों और कृषि विभाग के अधिकारियों को कड़े निर्देश जारी किए हैं।
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सेटेलाइट निगरानी: अब पराली जलाने वाली जगहों की पहचान सेटेलाइट के जरिए की जा रही है।
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जुर्माना: दोषी किसानों पर 2,500 से 15,000 रुपये तक का जुर्माना लगाने का प्रावधान है।
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विकल्प: सरकार किसानों को पराली न जलाकर उसे गौठानों में दान करने या ‘डीकंपोजर’ का उपयोग कर खाद बनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।

