CG News : धमतरी। भारत में दशहरा और होली जैसे त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक माने जाते हैं। दशहरे पर रावण दहन और होली से पहले होलिका दहन की परंपरा देशभर में निभाई जाती है। लेकिन छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में एक ऐसा गांव है, जहां इन दोनों परंपराओं का पालन नहीं किया जाता। इतना ही नहीं, गांव की सीमा के भीतर किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसका अंतिम संस्कार भी नहीं किया जाता। तेलीनसत्ती गांव में सदियों से चली आ रही इन अनूठी परंपराओं के पीछे सत्ती माता से जुड़ी धार्मिक मान्यता बताई जाती है।
दशहरे पर नहीं होता रावण दहन
धमतरी जिले के तेलीनसत्ती गांव की परंपराएं आसपास के दूसरे गांवों से अलग हैं। यहां दशहरे के अवसर पर रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता। जहां देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग रावण दहन के जरिए बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाते हैं, वहीं इस गांव में यह परंपरा निभाने से परहेज किया जाता है।
ग्रामीणों के अनुसार, इसके पीछे सत्ती माता से जुड़ी आस्था और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताएं हैं। गांव के लोग इन परंपराओं का सम्मान करते हैं और धार्मिक विश्वास के अनुसार त्योहार मनाते हैं।
होली पर भी नहीं किया जाता होलिका दहन
तेलीनसत्ती गांव की खासियत केवल दशहरे तक सीमित नहीं है। यहां होली के अवसर पर भी होलिका दहन नहीं किया जाता। आमतौर पर होली से एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है, जिसे बुराई के अंत और अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है।
हालांकि, इस गांव में प्रचलित मान्यता के कारण होलिका दहन की परंपरा नहीं निभाई जाती। स्थानीय लोगों के लिए यह केवल एक रस्म का पालन न करना नहीं, बल्कि उनकी धार्मिक आस्था और परंपरागत विश्वास से जुड़ा विषय है।
गांव की सीमा में मृत्यु होने पर भी अलग परंपरा
तेलीनसत्ती गांव की एक अन्य मान्यता भी लोगों का ध्यान खींचती है। बताया जाता है कि गांव की सीमा के भीतर किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसका अंतिम संस्कार गांव की सीमा के अंदर नहीं किया जाता। इस परंपरा को भी सत्ती माता से जुड़ी मान्यता के साथ जोड़कर देखा जाता है।
हालांकि, इस प्रथा के पीछे की ऐतिहासिक परिस्थितियों और इसके वास्तविक कारणों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

