Bharat ne kaise banayi cheeni : नई दिल्ली। आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में चीनी का इस्तेमाल इतना आम है कि चाय, मिठाई और कई खाद्य पदार्थों की कल्पना इसके बिना मुश्किल लगती है। लेकिन जिस चीनी को आज दुनिया भर में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है, उसके इतिहास की जड़ें हजारों साल पुरानी हैं। गन्ने की खेती और उससे मीठा पदार्थ तैयार करने की तकनीक के विकास में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।
न्यू गिनी से भारत तक पहुंचा गन्ना
अध्ययनों के अनुसार, गन्ने की शुरुआती उत्पत्ति और घरेलूकरण का संबंध न्यू गिनी क्षेत्र से माना जाता है। समय के साथ गन्ने की खेती दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंची।
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भारत में गन्ने से रस निकालने और उसे संसाधित करने की तकनीकों का विकास हुआ। धीरे-धीरे सिर्फ गन्ने का रस या गुड़ ही नहीं, बल्कि ठोस और अधिक शुद्ध मीठा पदार्थ तैयार करने की प्रक्रिया विकसित हुई।
चीनी के क्रिस्टल बनाने की तकनीक
प्राचीन भारत की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गन्ने के रस को उबालकर और उसे विशेष प्रक्रिया से ठोस क्रिस्टल में बदलना माना जाता है। इस प्रक्रिया ने चीनी को लंबे समय तक सुरक्षित रखने और दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुंचाने को आसान बनाया।
ऐतिहासिक स्रोतों में संस्कृत के ‘शर्करा’ शब्द का उल्लेख मिलता है, जिसका संबंध चीनी के क्रिस्टल से माना जाता है। यही शब्द आगे चलकर कई भाषाओं में चीनी के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्दों के विकास से जुड़ा माना जाता है।
भारत की मिठास दुनिया तक पहुंची
भारत से चीनी बनाने की जानकारी धीरे-धीरे दूसरे क्षेत्रों तक पहुंची। व्यापार और यात्राओं के माध्यम से गन्ने और चीनी से जुड़ी तकनीक पश्चिम और मध्य एशिया तक पहुंची। बाद में अरब व्यापारियों ने भी चीनी के उत्पादन और व्यापार को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसी कारण शुरुआती दौर में यूरोप में चीनी को एक सामान्य खाद्य पदार्थ की बजाय दुर्लभ और महंगी वस्तु माना जाता था। इसका इस्तेमाल लंबे समय तक औषधीय और विशेष अवसरों से जुड़े उत्पाद के रूप में भी किया जाता रहा।

