स्लामाबाद। भारत द्वारा सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) को निलंबित किए जाने के बाद पाकिस्तान में जल संकट को लेकर चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। देश के कई प्रमुख जलाशयों और बांधों में जलस्तर घटने की खबरों के बीच पानी की उपलब्धता को लेकर लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। इस बीच पाकिस्तान के कई वरिष्ठ नेताओं ने भारत के फैसले की आलोचना करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की मांग की है, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है।
इस्लामाबाद में सिंधु जल संधि पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में सिंधु जल संधि को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया गया, जिसमें विभिन्न देशों के विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। विशेषज्ञों ने सार्वजनिक मंच पर संयमित रुख अपनाया, लेकिन पाकिस्तान के कई नेताओं ने भारत पर गंभीर आरोप लगाए।
नेताओं का कहना था कि यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया तो पाकिस्तान को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही उन्होंने आशंका जताई कि संधि बहाल नहीं होने की स्थिति में क्षेत्रीय तनाव और बढ़ सकता है।
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने लिया था फैसला
भारत ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को निलंबित करने का निर्णय लिया था। इसके साथ ही भारत ने सिंधु नदी प्रणाली से जुड़ी जलविद्युत और सिंचाई परियोजनाओं पर कार्य तेज करने की घोषणा भी की।
भारत का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है और आतंकवाद के खिलाफ सख्त नीति के तहत विभिन्न द्विपक्षीय समझौतों की समीक्षा की जा रही है। वहीं पाकिस्तान का दावा है कि इस फैसले का उसकी जल सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
बिलावल भुट्टो ने जताया विरोध
पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी ने कहा कि सिंधु नदी पाकिस्तान की जीवनरेखा है और यदि पाकिस्तान के हिस्से का पानी रोका गया तो देश चुप नहीं बैठेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत सिंधु जल संधि को निलंबित कर पाकिस्तान पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहा है। साथ ही उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अपने जल अधिकारों की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएगा।
रक्षा मंत्री और पर्यावरण मंत्री ने भी जताई चिंता
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि पानी अब राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बन चुका है और इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
वहीं पर्यावरण मंत्री मुसद्दिक मलिक ने कहा कि सिंधु जल संधि दुनिया की सबसे सफल जल संधियों में से एक रही है और इसका सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यह व्यवस्था पूरी तरह समाप्त होती है तो पाकिस्तान को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।
जल संकट ने बढ़ाई चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान पहले से ही जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, बढ़ती आबादी और कमजोर जल प्रबंधन जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में यदि जल संरक्षण और संसाधन प्रबंधन में सुधार नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में जल संकट और गहरा सकता है। हाल के दिनों में पाकिस्तान के कई इलाकों में पानी की कमी को लेकर विरोध प्रदर्शन और बेहतर जल प्रबंधन की मांग भी सामने आई है।
क्या है सिंधु जल संधि?
सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी। इस समझौते के तहत रावी, ब्यास और सतलुज जैसी पूर्वी नदियों का उपयोग मुख्य रूप से भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों का अधिकांश जल पाकिस्तान के हिस्से में गया। भारत को इन पश्चिमी नदियों पर सीमित उपयोग का अधिकार दिया गया।
करीब छह दशकों तक यह संधि दोनों देशों के बीच लागू रही और इसे दुनिया की सबसे सफल अंतरराष्ट्रीय जल संधियों में गिना जाता रहा है।
भारत का रुख
भारत का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ उसकी नीति स्पष्ट है। सरकार के अनुसार, जल संसाधनों के उपयोग से जुड़े सभी निर्णय भारतीय कानूनों, अंतरराष्ट्रीय दायित्वों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर लिए जा रहे हैं। वहीं पाकिस्तान लगातार इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिश कर रहा है।

