Rebellion in Indian Politics : नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र की राजनीति इन दिनों एक बार फिर दलों के भीतर उठ रही बगावत और संभावित टूट की चर्चाओं से गर्म है। जहां पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर असंतोष और गुटबाजी की खबरें सुर्खियों में हैं, वहीं महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) को भी नए राजनीतिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में भारतीय राजनीति का इतिहास एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर रहा है कि पार्टी में बगावत के बाद आखिर कौन मजबूत हुआ और कौन राजनीतिक तौर पर कमजोर पड़ गया?
भारतीय राजनीति में बगावत कोई नई बात नहीं
देश की राजनीति में दलों के भीतर मतभेद और विभाजन का लंबा इतिहास रहा है। कई बार नेताओं की महत्वाकांक्षा, वैचारिक मतभेद या नेतृत्व को लेकर असहमति ने बड़े राजनीतिक दलों को तोड़ दिया। कुछ मामलों में बगावत करने वाले नेता नई ताकत बनकर उभरे, जबकि कई बार मूल पार्टी ही कमजोर हो गई।
कांग्रेस: सबसे ज्यादा टूट का सामना करने वाली पार्टी
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने स्वतंत्रता के बाद सबसे अधिक राजनीतिक विभाजन देखे हैं। 1969 में कांग्रेस का पहला बड़ा विभाजन हुआ, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और संगठन के वरिष्ठ नेताओं के बीच टकराव बढ़ गया। इसके बाद कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (आर) अस्तित्व में आईं। समय के साथ इंदिरा गांधी का गुट मजबूत हुआ और मूल संगठन हाशिये पर चला गया।
इसके बाद भी कांग्रेस से अलग होकर कई क्षेत्रीय दल बने, जिनमें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी), तृणमूल कांग्रेस और वाईएसआर कांग्रेस जैसे दल शामिल हैं, जिन्होंने अपने-अपने राज्यों में मजबूत राजनीतिक आधार तैयार किया।
तृणमूल कांग्रेस: कांग्रेस से निकली और बंगाल की सबसे बड़ी ताकत बनी
ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। शुरुआत में इसे एक राजनीतिक जोखिम माना गया, लेकिन समय के साथ टीएमसी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में वाम दलों और कांग्रेस दोनों को पीछे छोड़ दिया। आज पार्टी राज्य की प्रमुख राजनीतिक शक्ति है।
हालांकि अब टीएमसी के भीतर भी असंतोष और गुटीय संघर्ष की खबरें सामने आ रही हैं, जिससे राजनीतिक समीकरणों पर नजर रखी जा रही है।
शिवसेना: बगावत ने बदल दी महाराष्ट्र की राजनीति
महाराष्ट्र में शिवसेना का विभाजन हाल के वर्षों का सबसे बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम माना जाता है। 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायक अलग हो गए, जिसके बाद उद्धव ठाकरे की सरकार गिर गई और राज्य की सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदल गया।
बाद में चुनाव आयोग ने भी पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह शिंदे गुट को आवंटित कर दिया। इससे उद्धव ठाकरे गुट को संगठनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बड़ा झटका लगा। अब यदि सांसदों के स्तर पर भी टूट होती है, तो यह शिवसेना (यूबीटी) के लिए नई चुनौती साबित हो सकती है।
एनसीपी में भी दिखी थी बड़ी बगावत
महाराष्ट्र में ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) भी विभाजन का सामना कर चुकी है। अजित पवार के नेतृत्व में पार्टी का एक बड़ा धड़ा अलग हुआ और सत्ता पक्ष के साथ चला गया। इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में नई परिस्थितियां पैदा कर दीं और एनसीपी के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े किए।
बगावत के बाद कौन जीतता है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी पार्टी में बगावत के बाद केवल संख्या ही निर्णायक नहीं होती। संगठन, जनाधार, नेतृत्व क्षमता और जनता का समर्थन तय करता है कि कौन सा गुट लंबे समय तक टिकेगा।
कई बार बगावत करने वाले नेता सत्ता और संगठन दोनों हासिल कर लेते हैं, जबकि कई बार मूल पार्टी जनता के समर्थन के दम पर वापसी कर लेती है। इसलिए हर राजनीतिक विभाजन का परिणाम अलग-अलग परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
वर्तमान संकट पर सबकी नजर
बंगाल में टीएमसी के भीतर चल रही कथित कलह और महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) के सामने खड़ी नई चुनौतियों ने एक बार फिर भारतीय राजनीति में दल-बदल और बगावत की बहस को तेज कर दिया है। आने वाले दिनों में इन घटनाक्रमों का असर न केवल संबंधित राज्यों की राजनीति पर पड़ेगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य को भी प्रभावित कर सकता है।
भारतीय राजनीति का इतिहास यही बताता है कि बगावत कभी किसी नेता को शिखर तक पहुंचा देती है तो कभी किसी मजबूत राजनीतिक संगठन को कमजोर कर देती है। इसलिए हर नई राजनीतिक टूट अपने साथ नए समीकरण और नई संभावनाएं लेकर आती है।

